उपन्यास >> प्रगतिशील प्रगतिशीलगुरुदत्त
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इस लघु उपन्यास में आचार-संहिता पर प्रगतिशीलता के आघात की ही झलक है।
‘‘स्वास्थ्य तो ठीक है?’’
‘‘स्टूडियो वालों के लिए तो मैं आज बीमार हूं। परन्तु वास्तव में आज मैं बहुत ही प्रसन्न हूं।’’
‘‘सत्य?’’
‘‘हां, यह मेरे विवाहित जीवन का प्रथम दिवस हैं।’’
मदन कुछ नहीं बोला। लैसली ने ही पूछा, ‘‘क्यों, आपको प्रसन्नता नहीं है?’’
‘‘अभी मैं इस विषय में कुछ नहीं कह सकता। कॉलेज से लौटकर बात करूंगा।’’
‘‘आज कारखाने नहीं जायेंगे?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘मैं आपकी प्रतीक्षा करूंगी। आपसे विचार-विमर्श करना है।’’
जब वह कॉलेज से लौटा तो लैसली उत्सुकता से उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। दोनों घूमने के लिए निकल गये। घूमते-घूमते वे सेन्ट्रल एवेन्यू पार्क में पहुंच गये और वहां एक पेड़ के साये में बैंच पर बैठ गए। लैसली ने पूछा, ‘‘हां, अब बताइये, कैसा अनुभव करते हैं आप?’’
‘‘मेरे लिए तो जीवन में यह प्रथम ही अवसर है। इस कारण मैं इसका मूल्यांकन नहीं कर सका।’’
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