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उपन्यास >> प्रगतिशील

प्रगतिशील

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :258
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8573

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इस लघु उपन्यास में आचार-संहिता पर प्रगतिशीलता के आघात की ही झलक है।


‘‘मैं समझता हूं कि तुम अपना गलत अनुमान लगा रही हो। इसमें तो फोटोग्राफर की निपुणता है किन्तु उसमें वास्तविकता थी।’’

लैसली मुस्कराती हुई ध्यान से मदन को देख रही थी। मदन ने जब उसकी आंखों में देखा तो उसको उसमें आज एक विशेष चमक दृष्टिगोचर हुई। वह इसका अभी अभिप्राय जानने का प्रयत्न ही कर रहा था कि लैसली ने पूछा लिया, ‘‘तो क्या तुम उसको पुनः देखना चाहोगे?’’

‘‘निःसन्देह।’’

‘‘अथवा उसका वास्तविक रूप ही।’’

मदन उसका उत्तर नहीं दे सका। वह अनुमान करने लगा था कि लैसली उसको इस प्रकार किसी मार्ग पर ले जा रही है, जिस प्रकार कोई किसी बच्चे को उंगली से पकड़कर ले जाया जाता है। बच्चा चुपचाप उसका अनुसरण करता है। उस रात वह अपनी पढ़ाई करने नहीं जा सका। रात्रि के बारह बजे लैसली के कमरे से निकल वह अपने कमरे में जा कम्बल ओढ़ कर सो गया।

अगले दिन जब मदन अपने कॉलेज जाने की तैयारी करने लगा तो उसको ऐसा आभास मिला कि लैसली अपने कार्य पर नहीं गई है। उसने उसके कमरे में झाक कर देखा तो उसको विदित हुआ कि वह अभी भी सो रही है। उसको चिन्ता होने लगी कि कहीं वह रुग्ण न हो गई हो। उसने भीतर जा कर उसको जगाते हुए कहा, ‘‘काम पर नहीं जाना है क्या?’’

‘‘नहीं।’’

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