उपन्यास >> प्रगतिशील प्रगतिशीलगुरुदत्त
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इस लघु उपन्यास में आचार-संहिता पर प्रगतिशीलता के आघात की ही झलक है।
‘‘कब खिंचवाया था?’’
‘‘पिछले सप्ताह हमारे स्टूडियो के चीफ फोटोग्राफर ने लिया था।’’
‘‘तब तो निश्चित ही बहुत सुन्दर होगा?’’
‘‘आइए, आपको दिखाऊं।’’
मदन अपनी पढ़ाई के लिए अपने कमरे में जाने की अपेक्षा मिस साहनी के कमरे मे चला गया। लैसली ने अलमारी से एलबम निकाली और उसमें से नया चित्र निकाल कर मदन को दिखाने लगी। यह चित्र किसी उद्यान में लिया गया था। अत्यन्त ही आकर्षक पोज था। इससे मिस साहनी का सौन्दर्य द्विगुणित बढ़ गया था। मदन चित्र को देखकर अनायास ही कह उठा, ‘सुन्दर।’ लैसली उसको वहीं छोड़ बाथरूम में कपड़े बदलने के लिए चली गई। वह गई तो मदन ने खाली बैठने की अपेक्ष एलबम के अन्य चित्र देखने आरम्भ कर दिए। सहसा उसे लैसली के नग्न चित्र का स्मण हो आया। मदन ने उसे ही ढूढ़ना आरम्भ कर दिया। परन्तु वह उसे एलबम में नहीं मिला। वह अभी उस चित्र को ढूंढ़ ही रहा था कि लैसली रात्रि परिधान धारण किये हुए कमरे में आ गई। मदन को एलबम के पन्ने उलटते देख पूछने लगी, ‘‘क्या ढूंढ़ रहे हैं?’’
‘‘इस एलबम में से कुछ गुम हो गया है।’’
‘‘हां, हो तो गया है। किन्तु क्या करेंगे आप उसे देखकर?’’
‘‘कुछ नहीं। फिर भी मैं समझता हूं कि वह इससे भी सुन्दर था।’’
‘‘इस नये चित्र से भी?’’
‘‘हां।’’
‘‘क्या सौन्दर्य था उसमें? मेरी समझ में तो वह एक ‘अगली साइट’ ही थी। इसी कारण मैंने उसको यहां से निकाल कर पृथक रख दिया है।’’
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