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उपन्यास >> प्रगतिशील

प्रगतिशील

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :258
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8573

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इस लघु उपन्यास में आचार-संहिता पर प्रगतिशीलता के आघात की ही झलक है।


जिस सप्ताह लैसली को रात के कार्य पर जाना होता था, उसमें मदन और लैसली का परस्पर अधिक समय व्यतीत होता था। लैसली स्टूडियों से पांच-छः बजे आती तो मदन अभी सोया होता और वह उसको दरवाजा खटखटाकर जगाती और उसके साथ चाय पीती। यह मदन की बैड टी होती और मिस साहनी की सपर। चाय पीकर मदन तो अपनी तैयारी में लग जाता और मिस साहनी सोने के लिए अपने कमरे में चली जाती। मदन तैयार हो कॉलेज चला जाता और सात बजे क्लास में जा बैठता था। कॉलेज में एक घंटा पढ़ाई होती और तीन घंटे क्रियात्मक प्रशिक्षण। ग्यारह बजे वह लौटकर आता तो कुछ आराम कर वह लैसली को जगाने उसके कमरे में जा पहुंचता। उस समय वह रात्रि परिधान में खुले बाल सोई होती। मदन उसके बालों में खुजली कर उसको उठाता। साढ़े ग्यारह बजे लैसली स्नानादि करने चली जाती। दोनों एक बजे किसी होटल में लंच के लिए जाते। वहां से लैसली घूमने और बाजार देखने चली जाती और मदन अपने कारखाने चला जाता। प्रायः सायं पांच बजे लैसली उसको लेने उसके कारखाने में आती। वहां से निकल दोनों चाय पीते और फिर घूमने के लिए निकल जाते। जब मिस साहनी रात्रि का भोजन कर अपने स्टूडियो के लिए चल देती तो मदन घर आकर अपनी पढ़ाई में लग जाता।

जिस दिनों मिस साहनी की दिन की ड्यूटी होती, उन दिनों मिलने का समय बहुत कम मिलता था। केवल मध्याह्न के भोजन के समय ये दोनों इकट्ठे होते। मिस साहनी यत्न करती रहती थी कि वह उस सप्ताह अपनी रात की पढ़ाई बन्द कर दे और उसके साथ सिनेमा इत्यादि देखने जाये। मदनस्वरूप यह कह देता था कि यह समय तो पढ़ाई का है और वह इसे ही प्राथमिकता देना चाहता है।

इस प्रकार चलते हुए तीन मास व्यतीत हो गये। इस घनिष्ठता का एक दिन परिणाम निकल ही आया। वे दोनों रात्रि का भोजन कर घर आये तो मिस साहनी ने मदन से पूछा, ‘‘आपने मेरा नवीनतम चित्र देखा है क्या?’’

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