उपन्यास >> प्रगतिशील प्रगतिशीलगुरुदत्त
|
88 पाठक हैं |
इस लघु उपन्यास में आचार-संहिता पर प्रगतिशीलता के आघात की ही झलक है।
‘‘विचित्र बात है! आप मुझे बहुत पसन्द करते हैं। आपने कल मेरे साथ जो दो घंटे व्यतीत किये वे वण्डरफुल थे। आप मुझसे लड़ना भी नहीं चाहते। परन्तु उससे भी वचन-भंग करना नहीं चाहते। इस सब का क्या अर्थ है?’’
‘‘नहीं जानता। बता भी नहीं सकता। इस समय मैं समझने में असमर्थ हूं।’’
‘‘तो मत जानिये। मत बताइये, और समझने की भी आवश्यकता नहीं। जीवन को अपने स्वाभाविक ढर्रे पर चलने दीजिये।’’
‘‘अर्थात् बिना विवाह के ही सम्बन्ध चलने दूं?’’
‘‘विवाह क्या होता है?’’
‘‘कानून से उस कार्य की स्वीकृति जो हमने बिना विवाह के किया है।’’
‘‘कानून की आवश्यकता तब पड़ेगी, जब हम एक-दूसरे पर किसी प्रकार का दावा करने का विचार करेंगे। उससे पूर्व ही चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं।
मदन गम्भीर हो गया। वह विचार कर रहा था और इस स्थिति में अपने मन की अवस्था का विश्लेषण कर रहा था। वह अनिश्चित मनबैठा था। उसने लैसली के मुख पर देखा। वह मन्त्र मुग्ध-सी उसको देख रही थी। दोनों की दृष्टि मिली और बिना समझे-बूझे बात तय हो गई। अपने दोनों के अतिरिक्त किसी के विषय में कुछ भी जानने की आवश्यकता नहीं रही। दोनों एक-दूसरे की बांह-में-बांह डाले वहां बैंच पर मौन बैठे रहे। एकाएक दूर टाऊन-हॉल की घड़ी में एक बजें का घण्टा बजा। लैसली ने कहा, ‘‘मुझे भूख लग रही है।’’
|