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उपन्यास >> प्रगतिशील

प्रगतिशील

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :258
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8573

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इस लघु उपन्यास में आचार-संहिता पर प्रगतिशीलता के आघात की ही झलक है।

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अमेरिका में पहुंच मदन ने महेश्वरी को एक पत्र सॉनफ्रांसिस्को से लिखा था। दूसरा पत्र उसने मिस्टर साहनी के घर पर पहुंचकर लिख दिया था। तदनन्तर वह प्रति सप्ताह उसको एक पत्र भेजता रहा था। उसका उत्तर भी यथा-समय उसको प्राप्त होता जा रहा था।

महेश्वरी के पत्रों में कुछ इस प्रकार के भाव होते थे, मानों उनका जन्म-जन्मान्तर का सम्बन्ध है, दोनों एक-दूसरे को जानते हों और भविष्य में उनका सदैव के लिए सम्बन्ध बना रहना है। अपने पत्रों मंो मदन को वह ‘परम-प्रिय प्रीतम! करके सम्बोधन किया करती थी। और पत्र का अन्त होता था, ‘‘आपकी सदा की दासी।’’

पत्रों में वह वहां की, अपने परिवार, मदन के बाबा तथा दादी का विस्तारपूर्वक वृत्तान्त लिखा करती थी। पत्र हिन्दी में आते थे और वे कभी लैसली के हाथ में चढ़ जाते तो वह न तो पढ़ सकती और न ही उसको उसके अर्थ जानने में कभी उत्सुकता होती थी।

परन्तु जीवन के उक्त स्मरणीय दिन के अनन्तर मदन स्वयं को लैसली के सम्मोहन में ग्रस्त अनुभव करने लगा। धीरे-धीरे उसके पत्र छोटे होने लगे। पहले पत्रों में जो स्पष्ट अमेरिकन जीवन का विवरण हुआ करता था, वह धुंधला पड़ने लगा और धीरे-धीरे संक्षिप्त, अस्पष्ट काल्पनिक और तदनन्तर निथ्या होने लगा। इसके बाद तो पत्र देर से जाने लगे। सप्ताह में एक पत्र की अपेक्षा अब मास में एक पत्र जाने लगा था। उन पत्रों में वह लिखता कि पढ़ाई का कार्य अत्यधिक होने से पत्र लिखने के लिए अवसर नहीं मिल पाता।

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