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नारी की व्यथा

नवलपाल प्रभाकर

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :124
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9590

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मधुशाला की तर्ज पर नारी जीवन को बखानती रूबाईयाँ


105. भूल गई सभी पुरानी बातें


भूल गई सभी पुरानी बातें
पाँचों को गले लगाया मैंने
अब सभी खुशी-खुशी से
अपने-अपने घर रहने लगे।

सभी पुत्र समान एक हैं,
न कोई छोटा बड़ा है।

मन चाहे उस घर जाती हूँ
क्योंकि मैं इक नारी हूँ।


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