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नारी की व्यथा

नवलपाल प्रभाकर

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :124
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9590

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मधुशाला की तर्ज पर नारी जीवन को बखानती रूबाईयाँ


108. आज इस समाज में औरत का


आज इस समाज में औरत का
दर्जा कितना छोटा हो गया
सब समझते हैं औरत को
मोजा अपने पाँव का।

जब मैला ये हो जाता है
सोचते हैं बदलने की।

विडम्बना ये समझाती हूँ
क्योंकि मैं इक नारी हूँ।


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