लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> पथ के दावेदार

पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710

Like this Hindi book 5 पाठकों को प्रिय

286 पाठक हैं

हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


उसके जाने पर भारती ने हाथ जोड़कर कहा, “यह म्लेच्छ का अन्न नहीं है। सब खर्च डॉक्टर साहब ने किया है। आप संकोच छोड़कर भोजन कीजिए।”

अपूर्व इस परिहास को प्रसन्नता से सहन न कर सका। वह किसी का छुआ अन्न नहीं खाता। होटल के भोजन में उसकी रुचि नहीं है। लेकिन व्यय किसी म्लेच्छ ने किया या ब्राह्मण ने, इसके लिए बेकार का कट्टरपन उसमें नहीं है। उसके बड़े भाइयों ने उसकी शुद्धाचारिणी मां को अनेक दु:ख दिए हैं। भली हो या बुरी हो, उसे माता की आज्ञा का उल्लंघन करने में अत्यंत पीड़ा होती है। भारती यह नहीं जानती-ऐसी बात नहीं है। फिर भी इस व्यंग्य से उसका मन दु:खी हो उठा। लेकिन कोई उत्तर न देकर वह आसन पर आ बैठा और भोजन करने लगा।

भारती कुछ दूर धरती पर बैठी रही। सहसा वह मन-ही-मन कुंठित हो उठा। ईसाई होने के कारण वह होटल के रसोईघर में नहीं गई थी। इतनी रात गए, सबका खाना-पीना हो चुकने के बाद जो कुछ बचा था, सरकार जी उसी को उठा लाए थे। उसे भारती ने देखा नहीं था।

कमरे में रोशनी पूरी न होते हुए भी उसे जो खाना दिखाई दिया उसे देखते ही स्तब्ध हो उठी। कितनी ही बार उसने अपने ऊपर वाले कमरे के फर्श के छेद से झांककर चोरी-छिपे इस व्यक्ति का भोजन करते देखा था। तिवारी की छोटी-से-छोटी गलती से ही इस चिड़चिड़े आदमी को भोजन बर्बाद होते भारती ने अनेक बार देखा था। वही व्यक्ति आज चुपचाप जब उस न खाने योग्य भोजन को खाने लगा तो वह चुप न रह सकी। व्याकुल होकर बोल उठी-”रहने दीजिए, रहने दीजिए-इसे खाने की आवश्यकता नहीं, आप इसे नहीं खा सकेंगे।”

अपूर्व विस्मित होकर बोला, “खा न सकूंगा? क्यों....?”

“नहीं, नहीं खा सकते।”

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book