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पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


यह कहकर उसने अलमारी खोली। टसर की एक सुंदर साड़ी निकालकर बोली, “एकदम पवित्र है। मैंने इसे कभी पहना नहीं है। उस छोटे कमरे में जाकर कपड़े बदल आइए। नीचे नल है। हाथ-मुंह धोकर संध्या-पूजा कर लीजिए।”

अचानक उसकी बातचीत का ढंग ऐसा बदल गया कि अपूर्व अवाक् रह गया। धीरे से बोला, “लाइए कपड़ा। मैं नीचे जाऊं, लेकिन मैं किसी के हाथ का भात न खा सकूंगा। यह कहे देता हूं।”

भारती कोमल होकर बोली, “सरकार जी अच्छे ब्राह्मण हैं। आचारहीन नहीं हैं। स्वयं रसोई बनाते हैं। सब खाते हैं उनके हाथ का। कोई भी आपत्ति नहीं करता। डॉक्टर साहब का खाना भी उन्हीं के यहां से आता है।”

अपूर्व का संदेह तब भी दूर नहीं हुआ। उदास मन से बोला, “जिस-तिस के हाथ की वस्तु से मुझे घृणा होती है।”

भारती हंसकर बोली, “जिस-तिस के हाथ की वस्तु खाने के लिए क्या मैं आपको दे सकती हूं? मैं उन्हीं से मंगवाऊंगी। तब तो आपको कोई आपत्ति नहीं होगी?” -यह कहकर वह हंस पड़ी।

अपूर्व नीचे चला गया। लेकिन उसके चेहरे का भाव देखकर भारती को यह समझने में देर नहीं लगी कि होटल का खाना खाने में उसे संकोच हो रहा है।

अपूर्व रेशमी साड़ी लपेटकर काठ की बेंच पर बैठा संध्या कर रहा था। भारती बाहर जाती हुई बोली, “सरकार जी को लेकर लौटने में मुझे देर नहीं लगेगी। तब तक आप नीचे ही रहिएगा।”

भारती को लौटने में देर हुई भी नहीं। अपूर्व संध्या-पूजा कर चुका था। भारती के साथ सरकार जी थे। उनके हाथ में भोजन का थाल था। धरती पर जल छिड़ककर फिर चौका ठीक करके थाल रख दिया।

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