ई-पुस्तकें >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
“मैं क्या जानूं?”
भारती बोली, “होटल में डॉक्टर साहब के कमरे में आपके लिए बिस्तर ठीक करने को कह आई हूं। शायद व्यवस्था हो गई हो।”
“वहां मुझे कौन ले जाएगा? मुझे तो पता नहीं।”
“मैं चलती हूं।”
“चलिए,” कहकर अपूर्व उठ खड़ा हुआ। फिर कुछ संकोच के साथ बोला, “लेकिन तकिया और बिछौने-चादर लेता जाऊंगा। दूसरे के बिछौने पर मैं सो नहीं पाऊंगा।”
यह कहकर बिछौना उठाने जा रहा था कि भारती ने रोक दिया। इतनी देर के बाद उसका गम्भीर चेहरा हंसी से खिल उठा। लेकिन उसे छिपाने के लिए मुंह फेरकर धीरे से बोली, “यह भी तो दूसरे का ही बिछौना है अपूर्व बाबू! इस पर बैठने में आपको घृणा का अनुभव न होता हो तो भारी आश्चर्य है। लेकिन अगर ऐसा ही हो तो आपको होटल में सोने की जरूरत ही क्या है। आप यहीं सोइए।”
“लेकिन आप कहां सोएंगी? आपको कष्ट होगा।” भारती बोली, “नहीं,” फिर उंगली से दिखाकर कहा, “उस छोटे से कमरे में कुछ बिछाकर मैं अच्छी तरह सो सकूंगी। केवल काठ के फर्श पर हाथ को ही तकिया बनाकर तिवारी के पास कितनी ही रातें बितानी पड़ी थीं।”
एक महीने पहले की बात याद करके अपूर्व बोला, “एक रात मैंने भी देखा था।”
भारती ने हंसते हुए कहा, “यह बात आपको याद है? आज उसी तरह फिर देख लेना।”
“तब तो तिवारी बहुत बीमार था। लेकिन अब लोग क्या सोचेंगे?”
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