ई-पुस्तकें >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
“सोचेंगे क्या? दूसरों के बारे में व्यर्थ की कुछ सोचने का छोटा मन यहां किसी का नहीं है।”
“लेकिन नीचे की बेंच पर भी तो मैं सो सकता हूं?”
भारती बोली, “तब, जब मैं सोने दूं। इसकी आवश्यकता नहीं है। मैं आपके लिए अस्पृश्य हूं। इसलिए आपसे मुझे कोई हानि पहुंच सकती है, यह भय नहीं है।”
अपूर्व आवेग से बोला, “मुझसे आपका कभी अकल्याण हो सकता है, यह भय मुझे भी नहीं है। लेकिन किसी को अस्पृश्य कहने से मुझे सबसे अधिक पीड़ा होती है। अस्पृश्य शब्द में घृणा का भाव है। लेकिन आपसे तो घृणा नहीं करता। हम लोगों की जाति अलग है, इसलिए आपका छुआ मैं खा नहीं सकता। लेकिन इसका कारण क्या घृणा है? यह झूठ है। इसके लिए आप मन-ही-मन मुझसे घृणा करती हैं। उस दिन भोर में ही मुझे अथाह सागर में डालकर जब आप चली आईं उस समय की आपकी मुखाकृति मुझे आज भी याद है। उसे मैं जीवन भर न भूल सकूंगा।”
“सब कुछ चाहे भूल जाएं लेकिन मेरा यह अपराध न भूलिएगा।”
“कभी नहीं।”
“मेरी उस मुखाकृति में क्या भावना थी? घृणा?”
“अवश्य ही।”
भारती हंस पड़ी। बोली, “अर्थात मनुष्य का मन समझने की बुद्धि आपकी अत्यंत तीक्ष्ण है। है या नहीं? लेकिन अब जरूरत नहीं है। आप सो जाइए। मुझे तो रात को जगने का अभ्यास है। लेकिन आप और अधिक जागेंगे तो मुझे भुगतना होगा,” कहकर वह पास की कोठरी में चली गई।
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