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पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


भारती चली गई लेकिन अपूर्व की आंखों में नींद की छाया तक न थी। कमरे के एक कोने में टंगी हुई बत्ती टिमटिमा रही थी। बाहर रात का अंधकार छाया हुआ था। उसका सम्पूर्ण शरीर मानो रोम-रोम में यह अनुभव करने लगा कि कमरे में इस बिस्तर पर, इस नीरव रात में इसी प्रकार चुपचाप सो रहने की तरह सुन्दर वस्तु तीनों लोक में नहीं है।

प्रात:काल उसकी नींद भारती के पुकारने पर टूटी। आंखें खोलते ही उसने देखा- वह उसके पैरों के पास खड़ी है।

“उठिए, क्या ऑफिस नहीं जाना है।”

“जाना तो है। देख रहा हूं, आप नहा भी चुकी हैं।”

“आपको भी सारे काम जल्दी निपटा लेने चाहिए। कल अतिथि-सत्कार में काफी त्रुटि हुई। लेकिन आज हमारी प्रेसीडेंट का आदेश है कि आपको अच्छी तरह खिलाए-पिलाए बिना किसी भी तरह से न जाने दिया जाए।”

अपूर्व ने पूछा, “कल वाली स्त्री बच गई?”

“उसे अस्पताल भेज दिया गया। बचने की आशा तो है।”

उस स्त्री को अपूर्व ने कभी देखा नहीं था। फिर भी उसके कुशल-समाचार से उसने बड़ी राहत महसूस की। आज किसी का कोई भी अकल्याण मानो वह सह नहीं सकेगा। उसे ऐसा महसूस हुआ।

स्नान, संध्या-पूजा आदि समाप्त करके, कपड़े पहनकर तैयार होकर जब वह ऊपर पहुंचा तो लगभग नौ बज चुके थे। इसी बीच चौका ठीक करके सरकार जी भोजन रख गए। अपूर्व ने आसन पर बैठकर पूछा, “आपकी प्रेसीडेंट से तो मेरी भेंट नहीं हुई। क्या उनके अतिथि-सत्कार की यही रीति है।”

“आपके जाने से पहले भेंट हो जाएगी। आपके साथ उनको शायद कुछ जरूरी काम भी है।”

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