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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


पूँटू ने यथा आदेश कर्त्तव्य का सयत्न पालन किया। अतएव, ट्रेन में ही असमय में अयाचित दही-पेड़े मिल गये। खाते हुए सोचने लगा कि मेरे ही भाग्य में सारी अनहोनी हुआ करती है, सो इस बार कहीं पूँटू के लिए मैं ही हजार रुपये की कीमत का पात्र न चुन लिया जाऊँ! यह खबर उन्हें पहली बार ही मिल गयी थी कि मैं बर्मा में अच्छी नौकरी करने लगा हूँ।

राँगा दीदी बहुत ज्यादा स्नेह करने लगीं, और आत्मीय ज्ञान की वजह से पूँटू भी घण्टे भर में ही घनिष्ठ हो गयी, क्योंकि, मैं कोई दूसरा तो था नहीं!

लड़की अच्छी है। साधारण भद्र गृहस्थ घराने की, रंग गोरा तो नहीं था लेकिन देखने में सुन्दर थी। हालत यह हुई कि बाबा उसके गुणों का बखान खत्म ही न कर पा रहे थे। लिखने-पढ़ने के बारे में राँगा दीदी ने कहा, “वह ऐसी सुन्दर चिट्टी लिख सकती है कि आजकल के तुम्हारे नाटक और नॉविल भी हार मान जाँय। उस घर की नन्दरानी को एक ऐसी चिट्ठी लिख दी थी कि जमाई महाशय सात दिन के बजाय पन्द्रह दिन की छुट्टी लेकर आ पहुँचे।”

राजलक्ष्मी का उल्लेख किसी ने इंगित से भी नहीं किया जैसे उस तरह की कभी कोई बात हुई थी, यह किसी को याद तक नहीं!

दूसरे दिन गाँव के स्टेशन पर गाड़ी ठहरी तो मुझे भी उतरना पड़ा। उस वक्त करीब दस बजे थे। ठीक वक्त पर स्नानाहार न होने पर पित्त भड़क जाने की आशंका से वे दोनों जनें चिन्तित हो उठे। मकान पहुँचने पर मेरी खातिरदारी की सीमा न रही। पाँच-सात दिन के अन्दर ही गाँव-भर में किसी को यह सन्देह न रहा कि पूँटू का वर मैं ही हूँ। यहाँ तक कि पूँटू को भी सन्देह न रहा।

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