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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
बाबाजी ने चाहा कि यह शुभ कार्य आगामी वैशाख महीने में ही सम्पन्न हो जाय। पूँटू के रिश्तेदार जो जहाँ थे उन्हें बुला लेने की बात भी उठी। राँगा दीदी ने पुलकित हृदय से कहा, “देखते हो, किसी के भाग्य में कौन बदा है, यह पहले से कोई भी नहीं बता सकता!”
मैं पहले उदासीन था, फिर चिन्तित हुआ, और उसके बाद डरा। क्रमश: अपने ऊपर ही सन्देह होने लगा कि कहीं मैंने मंजूरी तो नहीं दे दी! मामला ऐसा बेढब हो गया कि कहीं पीछे कोई बुरी घटना न घट जाय इसलिए ना कहने का साहस ही न रहा। पूँटू की माँ यहीं थी। एक दिन रविवार को एकाएक उसके पिता के भी दर्शन हो गये। मुझे कोई नहीं जाने देना चाहता, आमोद-प्रमोद और हँसी-मजाक भी होने लगा- पूँटू मेरे ही सिर पड़ेगी, सिर्फ थोड़े दिनों की देर है- शनै:-शनै: ऐसे लक्षण ही चारों ओर स्पष्ट नजर आने लगे। जाल में फँसा जा रहा हूँ, मन को शान्ति नहीं मिलती- जाल तोड़कर बाहर भी नहीं निकल पाता। ऐसे वक्त अचानक एक सुयोग मिला। बाबा ने पूछा, “तुम्हारी कोई जन्मपत्री है या नहीं? उसकी तो जरूरत है।”
जोर लगाकर सारे संकोचों को दूर करके कह बैठा, “आप लोगों ने पूँटू के साथ मेरा विवाह करना क्या सचमुच स्थिर कर लिया है?”
बाबा मुँह फाड़कर थोड़ी देर तक अचम्भे से देखते रहे, फिर बोले, “वाकई? सुन लो इनकी बात!”
“पर मैं तो अभी तक स्थिर नहीं कर पाया हूँ।”
“नहीं कर पाये तो अब कर लो। लड़की की उम्र मैं चाहे बारह-तेरह वर्ष की बताऊँ या और कुछ, लेकिन असल में वह सतरह-अठारह साल की है। इसके बाद हम इस लड़की की शादी कैसे करेंगे?”
“पर वह मेरा दोष तो नहीं है?”
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