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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
पूछा, “पूँटू, मैं तुम्हें पसन्द हूँ?”
पूँटू ने लज्जा से मुँह नीचा कर जरा सिर हिला दिया।
“पर मैं भी तो तुमसे चौदह-पन्द्रह साल बड़ा हूँ?”
पूँटू ने इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं दिया।
पूछा, “तुम्हारा क्या और कहीं कोई सम्बन्ध नहीं हुआ था?”
पूँटू ने खुश होकर मुँह ऊपर उठाते हुए कहा, “हुआ तो था। आप अपने गाँव के कालिदास बाबू को जानते हैं? उनके छोटे लड़के ने बी.ए. पास किया है। उम्र भी मुझसे थोड़ी ही ज्यादा है। उसका नाम शशधर है।”
“वह तुम्हें पसन्द है?”
पूँटू हठात् हँस पड़ी।
मैंने कहा, “पर शशधर अगर तुम्हें पसन्द न करे?”
पूँटू ने कहा, “पसन्द क्यों न करेगा? हमारे मकान के सामने होकर बार-बार आता-जाता रहता है। राँगा दीदी हँसी में कहती थीं कि वह सिर्फ मेरे लिए ही चक्कर काटता है।”
“तो यह शादी क्यों नहीं हुई?”
पूँटू का चेहरा मलिन हो गया। कहा, “उसके पिता हजार रुपये नकद और हजार रुपये के गहने माँगते थे। ऊपर से शादी में भी पाँच सौ रुपये खर्च न हो जाते? इतना तो जमींदार के घर की लड़की के लिए ही हो सकता है। सच है न? वे बड़े आदमी हैं, उनके पास बहुत रुपये हैं मेरी माँ उनके यहाँ गयी और बहुत हाथ-पैर जोड़े, पर उन्होंने एक नहीं सुनी।”
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