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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“शशधर ने कुछ नहीं कहा?”
“नहीं, कुछ नहीं। पर वह भी तो बहुत बड़ा नहीं है- उसके माँ-बाप जिन्दा हैं न?”
'यही सही है। शशधर की शादी हो गयी?”
पूँटू ने व्यग्र होकर कहा, “नहीं, अभी नहीं हुई। सुना है कि जल्दी ही होगी।”
“अच्छा, वहाँ तुम्हारी शादी हो जाने पर अगर वे लोग तुमसे प्रेम न करें?”
“मुझसे? प्रेम क्यों नहीं करेंगे? मैं रसोई बनाना, सिलाई करना और गृहस्थी के सारे काम जानती हूँ? मैं अकेली ही उनका सारा काम कर दूँगी।”
इससे ज्यादा बंगाली घराने की लड़की और क्या जानती है? शारीरिक परिश्रम द्वारा ही वह सब कमियों की पूर्ति करना चाहती है। पूछा, “उन लोगों का सब काम अवश्य करोगी न?”
“हाँ, निश्चय करूँगी।”
“तो तुम अपनी माँ से जाकर कह दो कि श्रीकान्त दादा ढाई हजार रुपये भेज देंगे।”
“आप भेज देंगे? तो फिर वायदा कीजिए कि शादी के दिन आयेंगे?”
“अच्छा, आऊँगा।”
दरवाजे की देहली पर बाबा की आवाज़ सुनाई दी।
उन्होंने लाँग से मुँह पोंछते-पोंछते प्रवेश किया और कहा, “तुम्हारा पायखाना तो बहुत अच्छा है भैया! सो जाने की इच्छा होती है। गया कहाँ रतन, और एक चिलम तम्बाकू सजा दे न।”
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