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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


कमललता ने होठ दबाकर हँसते हुए कहा, “यह नहीं होगा ठाकुर, नहीं होगा। वह नाम मैं नहीं ले सकती- अपराध होता है। आओ।”

“आता हूँ, पर अपराध किसका?”

“किसका-यह सुनकर तुम क्या करोगे; तुम तो खूब हो!”

जो वैष्णवी माला गूँथ रही थी वह हँस पड़ी और उसने मुँह नीचा कर लिया। ठाकुरजी के कमरे में काले पत्थर और पीतल की राधा-कृष्ण की युगल मूर्तियाँ हैं। एक नहीं, बहुत-सी। यहाँ भी पाँच-छह वैष्णवियाँ काम में लगी हुई हैं। आरती का वक्त हो रहा है, साँस लेने की भी फुर्सत नहीं है।

भक्तिपूर्वक यथारीति प्रणाम कर बाहर आ गया। ठाकुरजी के कमरे के अलावा और सब कमरे मिट्टी के हैं, पर सँभाल-सफाई की सीमा नहीं है। बिना आसन के कहीं भी बैठते संकोच नहीं होता, तथापि कमललता ने सामने के बरामदे में एक ओर आसन बिछा दिया। कहा, “बैठो, तुम्हारे रहने का कमरा जरा ठीक कर आऊँ।”

“मुझे क्या आज यहीं रहना पड़ेगा?”

“क्यों, डर क्या है? मेरे रहते तुम्हें तकलीफ नहीं होगी।”

मैंने कहा, “तकलीफ के लिए नहीं कहता, पर गौहर जो नाराज होगा।”

वैष्णवी ने कहा, “यह भार मेरे ऊपर है। मेरे रखने पर तुम्हारा मित्र जरा भी नाराज न होगा।” कहकर वह हँसती हुई चली गयी।

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