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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


मैं अकेला बैठा हुआ अन्यान्य वैष्णवियों का काम देखने लगा। सचमुच ही उनके पास नष्ट करने को जरा भी वक्त नहीं है। मेरी ओर किसी ने घूमकर भी नहीं देखा। करीब दस मिनट बाद जब कमललता लौटकर आयी तब काम खत्म कर सब उठ गयी थीं। पूछा, “तुम इस मठ की अधिकारिणी हो क्या?”

कमललता ने जीभ काटकर कहा, “हम सब गोविन्दजी की दासी हैं- कोई छोटा-बड़ा नहीं है। एक-एक पर एक एक का भार है। मेरे ऊपर प्रभू ने यह भार दिया है।” कहकर उसने मन्दिर के उद्देश्य से हाथ जोड़कर सिर से लगा लिये। कहा, “अब कभी ऐसी बात जबान पर मत लाना।”

मैंने कहा, “ऐसा ही होगा। अच्छा, बड़े गुसाईं और गौहर गुसाईं क्यों नहीं दिखाई दे रहे हैं?”

वैष्णवी ने कहा, “वे अभी आते ही होंगे। नदी में स्नान करने गये हैं।”

“इतनी रात को? और इस नदी में?”

वैष्णवी ने कहा, “हाँ।”

“गौहर भी?”

“हाँ, गौहर गुसाईं भी।”

“पर मुझे ही क्यों नहीं स्नान कराया?”

वैष्णवी ने हँसकर कहा, “हम किसी को स्नान नहीं करातीं। वे अपने आप करते हैं। भगवान की दया होने पर एक दिन तुम भी करोगे और उस दिन मना करने पर भी नहीं मानोगे।”

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