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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“मेरा खयाल होता है, नहीं। तुम्हारा मन असली वैरागी का मन है- उदासीन का- तितली की तरह। तुम कभी किसी बन्धन को नहीं मानोगे।”
मैंने हँसकर कहा, “तितली की उपमा तो अच्छी नहीं है कमललता, यह तो सुनने में बहुत कुछ गाली जैसी है। मेरा प्रेमपात्र सचमुच में ही यदि कहीं कोई हो, तो उसके कानों में इसकी भनक पड़ने पर अनर्थ हो जायेगा।” वैष्णवी हँसी, बोली, “डर की कोई बात नहीं गुसाईं, वास्तव में यदि कोई होगी, तो मेरी बात का वह विश्वास नहीं करेगी, और तुम्हारी मधुमिश्रित चालाकी भी वह जीवन-भर नहीं पकड़ सकेगी।”
“तो फिर उसे दु:ख किस बात का? हो न चालाकी, परन्तु उसके निकट तो वही सही रहेगी।”
वैष्णणी ने सिर हिलाकर कहा, “ऐसा नहीं होता गुसाईं। सत्य का स्थान झूठ कभी नहीं ले सकता। वे भले ही न समझें, कारण भले ही उनके लिए स्पष्ट न हो, तो भी उनका अन्तर निरन्तर अश्रुमुख ही रहेगा। मिथ्या का काण्ड तो देखते ही हो; इसी तरह इस रास्ते पर न जाने कितने लोग आये। यह पथ जिनके लिए सत्य नहीं है, उनकी सारी साधना जल की धारा के तल की सूखी बालू की तरह हमेशा ही अलग-अलग रही है, कभी एकत्रित नहीं हुई।”
कुछ ठहरकर वह मानो अचानक मन ही मन बोल उठी, “वे रस के मर्म तक तो पहुँचते नहीं, इसीलिए प्राणहीन निर्जीव मूर्ति की निरर्थक सेवा करते-करते उनका जी दो दिन में ही हाँफ उठता है- सोचते हैं कि वह किस मोह के अन्धकार में अपने को दिन-रात ठगते हुए मरे जा रहे हैं। ऐसे लोगों को देखकर ही तुम लोग हमारा उपहास करना सीखते हो- पर मैं यह क्या फालतू बातें बक रही हूँ गुसाईं, इस सब असंलग्न प्रलाप की एक बात भी तुम नहीं समझोगे। पर यदि तुम्हारी कोई ऐसी है, तो तुम उसे भले ही भूल जाओ, पर वह तुम्हें नहीं भूल सकेगी, और न कभी उसकी आँखों का पानी ही सूखेगा।”
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