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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


मैंने स्वीकार किया कि उसके वक्तव्य का प्रथम अंश मैंने समझा, पर अन्तिम अंश के प्रतिवाद में कहा, “तुम क्या मुझसे यही कहना चाहती हो कमललता, कि मुझको प्यार करने का नाम ही है दु:ख पाना?”

“दु:ख की बात तो नहीं कही गुसाईं, कही है आँखों के पानी की बात।”

“पर कमललता, वे दोनों तो एक ही हैं, सिर्फ शब्दों का हेर-फेर है।”

वैष्णवी ने कहा, “नहीं गुसाईं, वह दोनों एक नहीं हैं। न तो शब्दों का ही हेर-फेर है और न भाव का ही औरतें न इससे डरती ही हैं, और न उससे बचना ही चाहती हैं। पर तुम समझोगे कैसे?”

“जब कुछ नहीं समझूँगा तो फिर मुझसे यह सब कहती ही क्यों हो?”

“बिना कहे रहा भी नहीं जाता जी। प्रेम की वास्तविकता को लेकर मर्दों का दल जब अपनी बड़ाई किया करता है, तब सोचती हूँ कि हमारी जाति उनसे अलग है। तुम लोगों के और हम लोगों के प्यार की प्रकृति ही भिन्न है। तुम लोग चाहते हो विस्तार और हम चाहती हैं गम्भीरता, तुम लोग चाहते हो उल्लास और हम चाहती हैं शान्ति। जानते हो गुसाईं, कि प्रेम के नशे से हम भीतर ही भीतर कितना डरती हैं। उसके उन्माद से हमारे हृदय की धड़कन नहीं रुकती।”

मैं कुछ प्रश्न करना चाहता था, किन्तु उसने मेरी ओर ध्यान ही नहीं दिया और भावों के आवेग में बोलना जारी रक्खा, “वह हमारा सत्य भी नहीं है, हमारा अपना भी नहीं है। वह दौड़-धूप की चंचलता जिस दिन रुकती है, केवल उसी दिन हम नि:श्वास छोड़कर आराम पाती हैं। ओ जी नये गुसाईं, प्रेम की बड़ी से बड़ी प्राप्ति, स्त्रियों के लिए, निर्भयता की अपेक्षा और कुछ नहीं है। पर यही चीज तुम लोगों से कोई कभी नहीं पाती?”

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