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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


याद आया, कल सारी दोपहरी-भर पीछे के बाँस के बन में दो पपीहों के उच्च गले की 'पिया पिया' पुकार की अविश्रान्त होड़ से मेरी दिवा-निन्द्रा में काफी विघ्न हुआ था; इस पर मेरी ही तरह क्षुब्ध हुआ कोई जल-काक नदी किनारे के वृक्ष पर और भी कठोर कण्ठ से बार-बार उनका तिरस्कार करके भी उन्हें चुप नहीं कर सका था। भाग्य अच्छा था कि इस देश में मोर नहीं है, नहीं तो उनके इस उत्सव के अखाड़े में आ पहुँचने पर तो मनुष्य टिक ही नहीं पाता। सो जो भी हो, दिन का उपद्रव अब भी शुरू नहीं हुआ था। शायद और भी थोड़ा-सा निर्विघ्न सो सकता किन्तु इसी समय गत रात्रि का संकल्प याद आ गया। परन्तु, अब चुपचाप खिसक चलने का भी मौका नहीं रहा, प्रहरियों की सतर्कता से काम बिगड़ चुका था। नाराज होकर बोला, “मैं 'गोपाल' भी नहीं हूँ और मेरे बिछौने में लाल भी नहीं हैं। इस समय आधी रात को सोते से जगाने की भला कहो तो क्या जरूरत थी?”

वैष्णवी ने कहा, “रात कहाँ है गुसाईं, तुम्हारी तो आज सुबह की गाड़ी से कलकत्ते जाने की बात थी! मुँह-हाथ धो लो, मैं चाय तैयार कर लाती हूँ। नहाना नहीं। आदत नहीं है, बीमार पड़ सकते हो।”

“हाँ, बीमार पड़ सकता हूँ। सुबह की गाड़ी से जब मेरी इच्छा होगी चला जाऊँगा, पर यह तो बताओ कि तुम्हें इस विषय में इतना उत्साह क्यों है?”

उसने कहा, “और किसी के उठने के पहले मैं तुम्हें बड़े रास्ते तक पहुँचा जो आना चाहती हूँ गुसाईं।” उसका चेहरा स्पष्टत: नहीं दिखाई दिया, पर बिखरे हुए बालों की ओर देखकर कमरे की इतनी कम रोशनी में भी यह जान गया कि वे गीले हैं, स्नान से निबटकर वैष्णवी तैयार हो गयी है।”

“मुझे पहुँचाकर फिर आश्रम में ही लौट आओगी न?”

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