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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


वैष्णवी ने कहा, “हाँ।”

रुपयों की उस छोटी-सी थैली को बिछौने पर रख उसने कहा, “यह रहा तुम्हारा बैग। रास्ते में होशयारी रखना- रुपये एक बार देख लो।”

एकाएक कुछ कहने के लिए शब्द न सूझे। फिर कहा, “कमललता, तुम्हारा इस रास्ते पर आना मिथ्या है। एक दिन तुम्हारा नाम था उषा, आज भी वही उषा हो- जरा भी नहीं बदल सकी हो।”

“क्यों, बताओ?”

“तुम भी कहो कि मुझसे रुपये गिनने के लिए क्यों कहा? गिन सकता हूँ यह क्या तुम सच समझती हो? जो सोचते कुछ और हैं और कहते कुछ और हैं उन्हें कपटी कहते हैं। जाने के पहले मैं बड़े गुसाईंजी से शिकायत कर जाऊँगा कि आश्रम के खाते से तुम्हारा नाम काट दें। तुम वैष्णव-दल के लिए कलंक हो।”

वह चुप रही। मैं भी क्षणभर मौन रहकर बोला, “आज सुबह मेरी जाने की इच्छा नहीं है।'

“नहीं है? तो थोड़ी देर और सो लो। उठने पर मुझे खबर देना- क्यों?”

“पर तुम अभी क्या करोगी?”

“मुझे काम है। फूल चुनने जाऊँगी।”

“इस अन्धकार में? डर नहीं लगता?”

“नहीं, डर किसका? सुबह की पूजा के फूल मैं ही चुनकर लाती हूँ। नहीं तो उन लोगों की बड़ी तकलीफ होती है।”

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