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मानसिक गुण - कृपा पर महाराज जी के प्रवचन
महाराज दशरथ ने यज्ञ किया और वे सफल हो गये। विश्वामित्रजी भी यज्ञ करते हैं पर उसे वे पूरा नहीं कर पाते। राक्षसगण उस यज्ञ को पूरा नहीं होने देते। इसका संकेत यही है कि व्यक्ति कितनी भी ऊँची स्थिति पर पहुँचा हुआ क्यों न हो और कितने भी श्रेष्ठ कर्म और यज्ञ में प्रवृत्त क्यों न हो, पर मारीच, सुबाहु और ताड़का उसका पीछा नहीं छोड़ते। इसकी व्याख्या तो विस्तार से यहाँ संभव नहीं, पर संकेत यही है कि जीवन में ये तीनों समस्या के रूप में बने ही रहते हैं। सांसारिक व्यक्ति की बात ही क्या, महर्षि विश्वामित्र जैसे महापुरुष के जीवन में भी ये तीनों विद्यमान दिखायी देते हैं।
विश्वामित्र के समान पुरुषार्थी व्यक्ति विश्व-इतिहास में अत्यन्त दुर्लभ है। उनका जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ था। उस समय प्रचलित मान्यता के अनुसार यदि वे जीवनभर सत्कर्मों का सम्पादन करते तो अगले जन्म में ही वे ब्राह्मण बन पाते। पर आप सब जानते ही हैं कि उन्होंने अपनी कठिन तपस्या और साधना के द्वारा उसी जन्म में ही ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त कर लिया। ऐसा विलक्षण पुरुषार्थ विश्वामित्रजी में था। उनके जीवन से जुड़े बड़े-बड़े उत्कृष्ट कोटि के चमत्कारों का भी वर्णन हमें पढ़ने को मिलता है। पर ऐसा महान् ब्रह्मर्षि भी अपने जीवन में एक दिन एक कमी का अनुभव करते हैं। गोस्वामीजी से किसी ने पूछ दिया - महाराज! बहुत से व्यक्ति भगवान् की भक्ति नहीं करते और भगवान् राम का आश्रय न लेकर वे संसारी व्यक्तियों का ही सहारा लिये हुए दिखायी देते हैं। तो आपको क्या लगता है कि उनके जीवन में निश्चिन्तता की स्थिति नहीं आ सकती? गोस्वामीजी ने कहा - भाई! मैं क्या कहूँ? मैं तो यही समझता हूँ कि जिसे जीवन में यदि किसी प्रकार की कमी का अनुभव नहीं हो रहा है, तो उसे भगवान् राम के समान कोई साहब मिल गया होगा- भरोसो आइहैं उर ताके, जो कहुँ लह्यो राम सों साहिब।
गोस्वामीजी कुछ दूसरे प्रकार के व्यक्तियों के बारे में बताते हुए कहते हैं कि कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो-
कै अपनी बल जाके,
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