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मानसिक गुण - कृपा पर महाराज जी के प्रवचन
महर्षि वाल्मीकि जी ने जिस राम को देखा वे न्यायालय वाले राम हैं और तुलसीदासजी ने भगवान् राम का वह रूप देखा जो घर में दिखायी देता है। इसीलिए दोनों के दृष्टिकोण में भिन्नता है। गोस्वामीजी को भगवान् राम न तो मर्यादापुरुषोत्तम के रूप में दिखायी देते हैं और न ही बहुत बड़े न्यायाधीश के रूप में दिखायी देते हैं। उनको तो बस यही दिखायी देता है कि श्रीराम से बढ़कर कोई कृपालु हुआ ही नहीं। इसका अर्थ है कि जिसने भगवान् राम का जिस रूप में परिचय पाया, उनसे जिस नाते से जुड़ा उसी दृष्टि से अपनी बात कह रहा है और वह स्वदृष्टि से ठीक कह रहा है। अत: ऐसी स्थिति में यह आवश्यक नहीं कि एक व्यक्ति की बात दूसरे को भी ठीक लगे। मैंने उनसे यह भी कहा कि भगवान् राम में केवल ये दो पक्ष ही दिखे ऐसी बात नहीं है, वे तो ईश्वर हैं अत: उनमें अनंत गुण विद्यमान हैं। और जहाँ तक इन दोनों की बात है तो ये भगवान् राम में ही नहीं, हम लोगों में भी विद्यमान हैं। हम सब भी मर्यादापुरुषोत्तम हैं। पर हमारे और भगवान् राम के कृपालु और मर्यादापुरुषोत्तम होने में एक बहुत बड़ा अन्तर है। भगवान् राम दूसरों के लिये कृपालु हैं और अपने लिये मर्यादापुरुषोत्तम हैं। हमारे सामने जब अपनी भूलों की बात आती है तो हम यही कहते हैं कि यह तो मानव स्वभाव है ऐसा तो होता ही रहता है। पर दूसरों के दोषों पर विचार करते समय हम बड़े न्यायप्रिय और कठोर बन जाते हैं और कृपा की बात तो दूर रही हम उस समय कठिन से कठिन दण्ड देने की बात तो कहते हैं। वस्तुत: हम अपने इन दोनों गुणों का दुरुपयोग ही करते हैं।
भगवान् में इन दोनों गुणों को देखकर यदि हम इनके द्वारा अपने जीवन में सुधार करें तब तो इसे उपयोगी माना जायेगा। यह जानने के बाद कि भगवान् बड़े कृपालु हैं और वे भक्तों के सब अपराधों को क्षमा कर देते हैं। यदि हमारे भीतर ईश्वर के प्रति समर्पण की, भक्ति की भावना का उदय हो तब तो यह बहुत अच्छी बात हुई। पर यदि व्यक्ति इससे प्रभावित होकर उन्मुक्त हो जांय और मनमाना अपराध करने लगे यह सोचकर कि प्रभु परम कृपालु हैं इसलिए क्षमा तो कर ही देंगे तो यह धारणा न तो ठीक और न ही कल्याणकारी है।
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