उपन्यास >> प्रारब्ध और पुरुषार्थ प्रारब्ध और पुरुषार्थगुरुदत्त
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प्रथम उपन्यास ‘‘स्वाधीनता के पथ पर’’ से ही ख्याति की सीढ़ियों पर जो चढ़ने लगे कि फिर रुके नहीं।
रामकृष्ण इस व्यंग्य को समझा नहीं। पंडित ने ही अपनी बात को आगे चलाया और कहा, ‘‘मैं समझता हूँ कि कलमा पढ़ने से ही एक इंसान मुसलमान होता है। तो क्या यह लड़की कलमा पढ़ती हुई पैदा हुई थी जो यह कहा जाता है कि जन्म से मुसलमान है?’’
‘‘परंतु पंडित जी! क्या सुंदरी किसी मुसलमान की लड़की है? उसकी माँ तो हिंदुआनी प्रतीत होती थी।’’
विभूतिचरण ने वह सब कुछ बताने की आवश्यकता नहीं समझी जो उसने महारानी जोधाबाई को बताया था। उसने केवल यह कहा, ‘‘यह तो तुमको मालूम है कि वह अवैध संतान थी। उसकी माँ विधवा थी। उसका गर्भ किससे था? यह उसने नहीं बताया। करीमखाँ की बात ठीक भी हो सकती है। मगर मैं तो यह मानता हूँ कि यह हिंदू माँ की लड़की थी और एक हिंदू के घर में पली थी। इस कारण वह हिंदू ही थी।’’
परंतु पंडित की इस युक्ति ने रामकृष्ण और उसकी पत्नी को प्रसन्न एवं संतुष्ट नहीं किया। उसने कुछ कहा नहीं, परंतु पति-पत्नी दोनों पंडित का मुंह देखते रह गए।
विभूतिचरण ने उनको गंभीर मुख मौन देख कहा, ‘‘परंतु मैं इतने मात्र से तुम्हें मुसलमान हो गया नहीं मानता।’’
पंडित जी के विदा होने के उपरांत राधा ने पति से कहा, ‘‘मैं समझती हूँ कि हमें अपने इस पाप-कर्म का प्रायश्चित करना चाहिए।’’
‘‘क्या प्रायश्चित्त करना चाहिए और क्यों?’’
‘‘हमने एक मुसलमान की संतान को अपने रसोई घर में बैठने और खाने-पीने दिया है और उसके हाथ का बना खाया-पीया है। हमें अपने पुरोहित जी से पता करना चाहिए कि किस प्रकार प्रायश्चित्त होगा।’’
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