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1857 का संग्राम

वि. स. वालिंबे

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :74
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8316

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संक्षिप्त और सरल भाषा में 1857 के संग्राम का वर्णन

ये बातें सुनकर बादशाह चेत गया। उसने बागियों की बात मान ली और कहा, ‘‘आपकी बातों से मैं सहमत हूँ। मैं आज दोपहर 12 बजे किले के प्रवेशद्वार पर आ जाता हूँ। आप सभी अपने सिपाहियों को बुलाइये। हम सभी मिलकर फिरंगियों पर हमला करेंगे। मैं मुहिम की बागडोर संभाल लूंगा।’’बयासी वर्ष के बूढ़े बादशाह की यह बात बिजली की तरह फैल गयी। पूरी दिल्ली की जनता में जोश आ गया। जनता ने जो हाथ आया वह हथियार—तलवार, बंदूकें आदि लेकर लाल किले के मैदान में आ गयी। जनता ने बादशाह की जय जयकार की। आजादी की लड़ाई के लिए सत्तर हजार लोगों ने बादशाह का साथ देने का फैसला किया। वे सभी बादशाह के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे।

बादशाह ठीक 12 बजे लाल किले के प्रवेश द्वार पर आ पहुंचा। लोगों ने हर्षोल्लास के साथ हाथ उठाकर अभिवादन किया। सभी ने बादशाह की जयजयकार की। बादशाह अब आगे बढ़ा रहा था। तभी उनका दोस्त एहसानुल्ला खान ने बादशाह के कानों में हल्के स्वर में कहा, ‘‘बादशाह हुजूर, आप यहीं रुकिये। सामने वाले मकानों में अंग्रेज सिपाही छिपे हैं। कोई आपको निशाना बना सकता है। इस समय कुछ भी हो सकता है। आपकी जान को खतरा है।’’

बादशाह रुक गया। वह पीछे हटा। लोगों ने दो घंटों तक बादशाह का इंतजार किया। आखिर नाराज होकर वे घर लौटने लगे। बादशाह ने रात के अंधेरे में लाल किला छोड़ा। वह कुछ नजदीकी लोगों को साथ लेकर पाँच मील दूरी पर हुमायूं की कब्र के पास पहुंचा। अब वह पूरी तरह बेवतन, बेसहारा हो गया था। कंपनी सरकार ने बादशाह की खोज की। कुछ ही घंटों में लेफ्टिनेंट हॉडसन हुमायूं की कब्र के पास पहुंचा। उसने बादशाह का आह्वान किया—आप हमारी शरण में आ जाइये। हम आपके मामले में नरमी से पेश आयेंगे। मैं सरकार की ओर से आपको अभयदान देता हूं। बादशाह फांसी का फंदा टालना चाहता था। उसने हॉडसन से अभयदान-पत्र मांगा। बादशाह पालकी में बैठकर लाल किले में वापस लौट पड़ा। उसके साथ उसकी लाड़ली बीबी जीनत महल भी थी। बादशाह को लाल किले में कैद कर दिया गया।

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