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कटी पतंग

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :427
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9582

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एक ऐसी लड़की की जिसे पहले तो उसके प्यार ने धोखा दिया और फिर नियति ने।


अंजना उसके प्रश्न पर घबरा गई। उससे कोई उत्तर नहीं बन पड़ा। वह अब पुलिस वालों के सामने क्या कहे और क्या न कहे!

''इंस्पेक्टर साहब! यह झूठ बक रही है।'' अपनी थरथराती आवाज में वह इतना ही कह सकी और बड़ी बेबस नजरों से इधर-उधर देखने लगी।

''आपने पहले कभी इस औरत को देखा है?'' तिवारी ने फिर प्रश्न किया।''

''नहीं।''

''तो फिर यह आपका असली नाम कैसे जानती है?''

''मेरा नाम पूनम है। मैं शेखर की विधवा हूं, डिप्टी साहब की बहू।''

''तो वह बच्चा किसका है?''

तिवारी के इस प्रश्न पर वह पल-भर के लिए चौंकी और फिर शबनम की ओर घृणा से देखते हुए बोली-''वह मेरा बच्चा है, राजीव!''

''इसका कहना है कि वह बच्चा इसका है। तुम इससे छीनकर ले आई हो।''

''नहीं। मैंने कहा ना इंस्पेक्टर साहब! यह झूठी है, कपटी है। यह मक्कार औरत है। मुझे किसी जाल में फंसाना चाहती है।''

''तुम्हें कैसे पता चला कि यह औरत मक्कार है?''

इंस्पेक्टर का यह प्रश्न सुनकर वह झेंप गई और एक उचटती-सी नजर शबनम पर डाली जो उसके उत्तर की प्रतीक्षा में थी।

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