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पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


सरकार जी के जीर्ण-शीर्ण होटल के एक बहुत ही भीतरी कमरे में डॉक्टर साहब रहते हैं। रोशनी नहीं है, हवा नहीं है। आस-पास गंदा पानी जमा हो जाने से बदबू फैल रही है। अत्यंत पुराने तख्तों पर पैर रखने से लगता है कि कहीं टूट कर न गिर पड़े। ऐसे ही एक गंदे तथा भद्दे कमरे में रास्ता दिखाती हुई भारती उसे ले गई तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही। उस कमरे में पहुंचकर कुछ देर तक तो अपूर्व को कुछ दिखाई ही नहीं दिया।

डॉक्टर साहब ने स्वागत करते हुए कहा, “आइए, अपूर्व बाबू!”

“ओह कैसा भयानक कमरा आपने ढूंढ़ निकाला है डॉक्टर साहब?”

“लेकिन कितना सस्ता है। दस आने महीना किराया है-बस।”

“अधिक है, बहुत अधिक है। दस पैसे ही उचित होता।”

डॉक्टर साहब बोले, “हम दु:खी लोग किस तरह रहते हैं, आपको आंखों से देखना चाहिए। बहुतों के लिए तो यही राज महल है।”

“तब तो भगवान मुझे महल से वंचित ही रखें।”

“सुना है, कल रात आपको बहुत कष्ट उठाना पड़ा। क्षमा कीजिएगा।”

“क्षमा तभी करूंगा जब आप यह कमरा छोड़ देंगे, इससे पहले नहीं।”

डॉक्टर हंस पड़े। बोले, “अच्छा ऐसा ही होगा।”

अब तक अपूर्व ने देखा नहीं था। उसे एक मोढ़े पर बैठी सुमित्रा को देखकर आश्चर्य हुआ। “आप यहां हैं? मुझे क्षमा करें, आपको मैंने देखा ही नहीं था।”

“अपराध आपका नहीं, अंधकार का है अपूर्व बाबू!”

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